कला अभ्यास

कला को सिखने का एक ही उपाय है। अभ्यास करो। ख़ूब अभ्यास करो। दिन रात एक कर दो। कला मे निखार तभी आता है जब आप उस कला को ख़ूब मन लगा के करते हैं। खाना पीना हसना रोना गाना- बज़ाना भूलना ही कला है। जब हर दिन एक नया दिन लगे , जब रूटीन लाइफ बोरिंग लगे, रस्ते मे आने वाला हर पत्थर छोटे छोटे ढेले के सामान लगने लगे तब समझना कि कला का व्य्सन हो गया। हम मानते हैं कि कला मे रूटीन जरूरी है। मगर ये रूटीन दैनिक जीवन का रूटीन नही। हर कलाकार अपना अपना स्टाइल से कला का अभ्यास करता है।मैं अभी कुछ दिन से कला को पढ के समझेने के फेर मे फस गया था। मुझे कुछ लोगों ने कहा कि लिखने के लिए पढना बहुत जरूरी है। ये बात सही है। हम इस बात को स्वीकार करते हैं। पुराणों मे भी कहा गया हैं जैसा खा ओ गे वैसा ही बनोगे। यानी कि जैसा पढोगे वैसा ही लिखोगे। मगर साहब जब भी मै पढने बैठता हूँ एक ही बात दिमाग मे आती है। समय कम है। जिन्दगी का कुछ अता पता नही। आज हैं कल को कहॉ जायेंगें किसी को पता नही है। पढ़ते ही रहेंगें तो लिखेंगें कब। अगर बिना लिखे मर गए तो मरी आत्मा को भी शांति नही मिलेगी। जब पढने बैठते हैं तो हेर छेज़ नया ही लगता है। और जब लिखने बैठते हैं तब भी सब कुछ नया ही लगता है। फिर प्रॉब्लम कहॉ हैं। कौन सा काम जयादा जरूरी है । आदमी के पास समय बहुत काम है और पढना जयादा है। उधेर नरक मे भी मेरी आत्मा तड़पती रहेगी । यहीं सब सोच के निर्णय किया कि लिखना जयादा जरूरी है। पढना , लिखने के लिए जरूरी है मगर उतना नही जितना कि लिखना पढने के liye। बहुत शुर वीर हैं जिन्होंने बिना पढे बहुत कुछ लिख दिया हैं । बाबा कबीर को मेरा प्रणाम रहेगा इस संदर्भ मे। बाबा कबीर से बड़ा लेखक विचारक संत महात्मा ना तो तो हुआ है और ना ही होगा।आज के दुनिया मे कबीर का पैदा होना मुश्किल है। कोई चांस ही नही है। सब तो पढ़ के बाद लिखने के फेर मे हैं तो फिर कबीर कहॉ से पैदा होगा । कोई घूम फिर के लिखे तब बात बने । कुर्सी पर बैठ के कंप्यूटर पर टाईप करने से समाज मे ना तो कोई परिवर्तन हुआ है और ना ही होनेवाला है।अगर समाज मे परिवर्तन करने के लिए नही लिख रहे हैं तब तो बात अलग है। मुझे तो भाई व्यसन हो गया है। कोसिस कर रहे हैं। मगर छूट ही नही रहा है। निकट भविष्य मे छूटने कि पूरी आशा है। अगर हम नही छोड़ पाये तो हमारा हालत मुझे छोड़ने पर मजबूर कर देगा। मुझे पता है । शत प्रतिशत। भाई खा ने पिने के लिए पैसा कहॉ से आएगा अगर यहीं करते रहे तो। अभी तो बाबूजी का राज है। एक दो महिना मस्ती मार लेते हैं। फिर तो कंप्यूटर के दर्शन भी दुर्लभ हैं। अच्छा भी होगा। कंप्यूटर नही रहेगा तब सही रहेगा। फालतू का समय बर्बाद होता है। कथा कहानी लिखो तब कोई फायदा भी हैं। ये पिद्दी पिद्दी लेख लिखने से ना तो लिखने कि शैली सुधरती है और ना ही पैसा मिलता है। हाँ कुछ टिपण्णी मिल जाता है। इन टिपण्णी से अपने अन्दर बिस्वास बढ़ता है। यहीं टिपण्णी है जो आजकल कितने को धोखा मे दाल रखा है। रातो रात लेखक बनने का ये सबसे अच्छा तरीका है। कुछ भी लिखो टिपण्णी तो आएगा ही। पहले वाली बात नही कि पेड के निचे बैठ के लिखते रहो और कोई पढने वाला ही नही। अरे आज तो जमाना फास्ट फोरवर्ड है। इधेर लिखा उधेर जवाब हाज़िर है। प्रसन्नता का क्या कहना। टिपण्णी पढा और मन पुलकित हुआ ।कभी कभी मुझे इन टिपण्णी पेर भी बिस्वास नही रहता है। लगता है कि कहीँ सामने वाला मुरुख तो नही बना रहा हैं । ये भाई कोई मुझे मूरख ना बनाए मुझे किरपा कर के ।अगर हमारी रचना घटिया हो तो घटिया कहिये और अगर बधिया है तो कुछ मत कहिये। पढ़ के चुप चाप पतली गली से निकल लीजिये । ऐसे मुझे अच्छी तरह से पता है कि इस मे कुछ है नही।