ये जिन्दगी
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ए जिन्दगी चल तुमको दिया
किसको दिया अपने परिवार को
भाग परिवार कभी किसी का अपना हुआ है
तो फिर किसको दिया अपनी महबूबा को
भाग महबूबा से तो मेरा बिस्वास पहले ही टूट चूका है
तो फिर जरूर समाज को दिया होगा
भाग कयों मज़ाक करता है समाज से मुझे कोई लगाव नही है
तब तो जरूर से यमराज को दिया होगा
भाग मेरी जिन्दगी तू कया बात करता है
मैं इतना कमजोर थोड़े ना हूँ जो टूट जाऊँगा
ए मेरी जिन्दगी ले अब उतर सुन मैंने तुझे दिया
इस कविता को मैंने तुझे दिया इस कहानी को
अब तुझसे मुझे कुछ नही चाहिऐ
और ना ही इस कविता से
मैं अकेला हूँ मुझे अकेला ही रहने दे ।
