फुलंगी
एक बंदर था बड़ा ही मुरूख रोज़ की तरह उस दिन भी वो ताड के पेड़ के उपर चढ़ और उतर कर रहा था बस एक ही काम सुबह से शाम तक । पेड़ पेर चढो और फिर उतारो। अभी पेड के निचे और अभी पेड के उपर। एक राहगीर महाशय उधर से गुजर रहे थे। थोड़ी बहुत थकावट थी और थोड़ी बहुत बन्दर का तमाशा देखने कि इच्छा । यहीं सब सोच के ताड़ के पेड के निचे खड़ा हो गए। बंदर जैसे ही महाशय जी को देखा दौड़ के उपर कि तरफ भागा। अभी पेड कि आधी दुरी ही चढ़ा था कि बिच मे ही रूक के सुस्ताने लगा। महाशय जी संसय मे पद गए . अखिर बन्दर बिच मे कयों रूक गया । कहीँ हमारी बजह से तो ऐसा नही कर रहा है। महाशय जी को बन्दर को टेस्ट करने कि इच्छा हुई और साहब जी पेड से दूर जा के खड़ा हो गए। उधेर महाशय जी का पेड से दूर हटना और इधेर बन्दर का निचे उतरना। एक ही साथ । ये बंदरवा तो लगता है पागल है महाशय जी मन ही मन फुसफुसाए। बन्दर को नाचने के उद्देश्य से महाशय जी फिर से एक बार पेड के करीब आये। बंदरवा महाशय जी को आते देखा और फुर से उपर के तरफ भागा। इस बार फिर जा के बिच मे ही रूक गया। मगर इस बार पहली बार से थोडा उपर चढ़ा था। मह्शय जी सोचने लगे, लगता है ये बन्दर कभी फुलंगी पर नही चधेगा । कामचोर बन्दर है। रहने दो मुझे नही देखना ऐसे बन्दर का नाच । हार फिर के महाशय जी जाने लगे, बंदरवा महाशय जी को जाते देख के फुर से निचे कि तरफ भागा। भाई साहब रूक गए। सोचा चलो जब बंदरवा निचे आ ही गया है तो कु पूछ लेते हैं। पूछा - हे मुरुख बंदर तुम पेड कि फुलंगी पर कयों नही चढ़ते हो।
बंदरवा ने एक लंबी सास लिया फिर बोला - देखिए महाशय जी पेड कि फुलंगी पर कोई मज़ा नही है। जो मज़ा है वो बिच मे है। ऊपर फुलंगी पर ताड़ी है। पिने मे मज़ा तो आता है। नशा भी बहुत है ताड़ी मे । मगर बस एक ही बार पिने मे मज़ा आता है। और तो और पिने के बाद जो नशा आता है उसमे कुछ नही दिखता है। दुनिया के सभी लोग छोटे छोटे दिखते हैं। सबसे बड़ा , सबसे बुद्धिमान , सबसे आमिर और जो भी है सब अपने आप मे ही दिखता है। यहीं सब सोच के हम यात्रा मे ही मगन हैं मंज़िल का नशा बेकार हैं।
