खता
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कभी सोचता हूँ
तुमसे खफा कयों हूँ
चार दिनों कि हैं जिन्दगी
पिछले दिनों को याद करके कयों जुदा हूँ
मैं चाहता हूँ सब कुछ भूलाना
मगर पता नही कयों सब कुछ जानते हुए भी
अनजान बाना ही रहता हूँ
पिछली बातो को
याद कर कर के रोता हूँ
मेरी जिन्दगी यहीं हैं
रोता हूँ हँसता हूँ
जगता हू सोता हू
मगर फिर भी अपने आप को अकेला ही पता हू
कया करूं किसी चीज़ को जानना एक बात है
और उस पे अमल करना अलग बात
अमल करना तो चाहता हूँ
मगर तुम्हारे पुराने किस्सों मे एक बार फिर बहल जाता हूँ
शायद अब मेरी जिन्दगी यहीं है
बफा और बेबफा के बिच मे
बस जिन्दगी जीना चाहता हूँ
